तालाश..

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इस भागती दौड़ती ज़िदगी मे,

कही खो सी रही हू मैं..

सपनो को केवल आँखों मे बसाये,

सो रही हू मै….

 

रखा खा कदम घर से बाहर,

सपनो के पिछा कर कुछ बनने के लिए..

पर आज इस हकीकत की भूल भुलैया मे,

भटक रही हू मैं….

 

आज मशीन बन दौड़ता हैं इन्सान,

और इनही इन्सानी मशीनो के बीच,

अपना पन ढूँढ रही हू मैं….

 

तरह- तरह के लोग देखे,

प्यार करने वाले देखे..

बदलते समह के साथ,

बदलते हमसफर देखे..

और देखे मतलबी चहरे भी….

इसीलिए तो आज एक तालाश मे हू मै,

इंसानियत की तालाश….

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